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Wednesday, 7 February 2018

यदि भगवान भोलेनाथ को खुश करना है तो यह वस्तु कदापि न चढ़ाये





भगवान भोलेनाथ को खुश करने के लिए आप उन्हें भांग-धतूरा और कई तरह के फूल चढ़ाते होंगे। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान शिव को सफेद रंग का फूल अतिप्रिय है, लेकिन सफेद रंग के सभी फूल भगवान भोलेनाथ को पसंद नहीं हैं।

अगर आप अनजाने में यह फूल भगवान भोलेनाथ को चढ़ा रहे हैं तो यह समझ लीजिए कि भगवान भोलेनाथ आप पर प्रसन्न होने की बजाए नाराज भी हो सकते हैं, क्योंकि शिव पुराण में एक खास फूल को भगवान शिव की पूजा के लिए वर्जित बताया गया है। इस फूल को भगवान शिव को अर्पित करने वाले पर भगवान शिव कृपा करने के बजाए नाराज हो जाते हैं इसलिए भूलकर भी सफेद रंग का एक खास सुगंधित फूल भगवान भोलेनाथ को नहीं चढ़ाएं।

इसलिए शिवजी को नहीं चढ़ता है यह फूल : भगवान शिव को जो फूल अप्रिय है, उस फूल का नाम है केतकी। इस फूल को भगवान शिव ने अपनी पूजा से त्याग कर दिया है। केतकी को भगवान शिव ने क्यों त्याग दिया, इसका उत्तर शिवपुराण में बताया गया है। शिवपुराण के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में विवाद हो गया कि दोनों में कौन अधिक बड़े हैं। विवाद का फैसला करने के लिए भगवान शिव को न्यायकर्ता बनाया गया। भगवान शिव की माया से एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। भगवान शिव ने कहा कि ब्रह्मा और विष्णु में से जो भी ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत बता देगा, वह बड़ा कहलाएगा। ब्रह्माजी ज्योतिर्लिंग को पकड़कर आदि पता करने नीचे की ओर चल पड़े और विष्णु भगवान ज्योतिर्लिंग का अंत पता करने ऊपर की ओर चल पड़े।

जब काफी चलने के बाद भी ज्योतिर्लिंग का आदि-अंत पता नहीं चल सका तो ब्रह्माजी ने देखा कि एक केतकी फूल भी उनके साथ नीचे आ रहा है। ब्रह्माजी ने केतकी के फूल को बहला-फुसलाकर झूठ बोलने के लिए तैयार कर लिया और भगवान शिव के पास पहुंच गए।

ब्रह्माजी ने कहा कि मुझे ज्योतिर्लिंग कहां से उत्पन्न हुआ, यह पता चल गया है, लेकिन भगवा‍न विष्णु ने कहा कि नहीं, मैं ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं जान पाया हूं। ब्रह्माजी ने अपनी बात को सच साबित करने के लिए केतकी के फूल से गवाही दिलवाई, लेकिन भगवान शिव ब्रह्माजी के झूठ को जान गए और ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया। इसलिए ब्रह्माजी पंचमुख से चार मुख वाले हो गए। केतकी के फूल ने झूठ बोला था इसलिए भगवान शिव ने इसे अपनी पूजा से वर्जित कर दिया है।





एकमुखी रुद्राक्ष से लेकर चौदह मुखी रुद्राक्ष के धारण करने के दिव्य और अवलौकिक मन्त्र



रुद्राक्ष के फल (रुद्र+अक्ष) शिवजी की आंख का प्रतिरूप हैं इसीलिए रुद्राक्ष शिवजी को सर्वाधिक प्रिय है। शिव पुराण में वर्णित है कि भगवान शंकर ने कड़ी तपस्या के उपरान्त  जब अपने नेत्र खोले तो उनके नेत्रों से कुछ अश्रु की बूंदे गिरीं। अश्रु की उन बूंदों से वहां रुद्राक्ष नामक एक वृक्ष पैदा हो गया। बस, तभी से रुद्राक्ष की उत्पत्ति मानी गई।

 
रुद्राक्ष के दर्शन, स्पर्श और उन पर किए जाने वाले जाप और रुद्राक्ष धारण करने से अनेक पापों और दुष्कर्मों का नाश होता है। रुद्राक्ष का जहां धार्मिक कार्यों में प्रयोग होता है, वहीं यह औषधीय गुणों से भी सराबोर है।
 
शिवपुराण में एकमुखी रुद्राक्ष से लेकर चौदह मुखी रुद्राक्ष के धारण करने के दिव्य मंत्र दिए गए हैं। आइए जानें ये विशेष मंत्र-
दिव्य मंत्र  
(1) ॐ हीं नमः, 
(2) ॐ नमः, 
(3) ॐ क्लिंनमः, 
(4) ॐ हीं नमः, 
(5) ॐ ही नमः, 
(6) ॐ हीं हूं नमः, 
(7) ॐ हूं नमः, 
(8) ॐ हूं नमः, 
(9) ॐ हीं हूं नमः, 
(10) ॐ हीं नमः, 
(11) ॐ हीं हूं नमः, 
(12) ॐ क्रौं क्षौ रौ नमः, 
(13) ॐ ह्रीं नमः 
(14) ॐ नमः।
 
इस प्रकार किसी भी रुद्राक्ष को धारण करने से पहले ये अनोखी बातें उपरोक्त मंत्रों का 108 बार जाप करके अपार श्रद्धा व विश्वास के साथ पहनने से निश्‍चित ही जीवन में सभी अच्छा ही अच्छा होगा।



महाशिवरात्रि के दिन उपवास और जागरण का विशेष महत्व क्यों जानने के लिए अवश्य पढ़े


अन्न में भी मादकता होती है। भोजन करने के बाद शरीर में आलस्य और तंद्रा का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है। अन्न ग्रहण न करने से शरीर चैतन्य और जागृत रहता है। परिणामस्वरूप जिस आध्यात्मिक अनुभूति और उपलब्धि के लिए शिव उपासना की जा रही है, उसमें कोई बाधा नहीं उत्पन्न होती। भूख प्राणीमात्र की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है।

इसलिए भूख को सहन करना, तितिक्षा की वृद्धि करना है। यदि भूख पर विजय पा ली गई तो ऐसी अन्य आदतों पर विजय प्राप्त करना भी आसान हो जाता है, जो भूख के समान गहरी नहीं होतीं। इसे तेज धारा केविपरीत तैरने का प्रयोग भी समझना चाहिए।

रात्रि जागरण के संदर्भ में श्रीकृष्ण के इन वाक्यों की ओर ध्यान देना चाहिए 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।' अर्थात जब संपूर्ण प्राणी अचेतन होकर नींद की गोद में सो जाते हैं तो संयमी, जिसने उपवासादि द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो, जागकर अपने कार्यों को पूर्ण करता है। कारण साधना सिद्धि के लिए जिस एकांत और शांत वातावरण की आवश्यकता होती है, वह रात्रि से ज्यादा बेहतर और क्या हो सकती है।

यह भगवान शंकर की आराधना का प्रमुख दिन है। अन्य देवों का पूजन-अर्चन दिन में होता है, लेकिन भगवान शंकर को रात्रि क्यों प्रिय हुई और वह भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को? यह बात विदित है कि भगवान शंकर संहार शक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अतः तमोमयी रात्रि से उनका स्नेह स्वाभाविक है। रात्रि संहारकाल की प्रतिनिधि है।

उसका आगमन होते ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार, जीवों की दैनिक कर्म-चेष्टाओं का संहार और अंत में निद्रा द्वारा चेतनता का संहार होकर संपूर्ण विश्व संहारिणी रात्रि की गोद में अचेत होकर गिर जाता है। ऐसी दशा में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रि प्रिय होना सहज ही हृदयंगम हो जाता है। यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में अपितु सदैव प्रदोष (रात्रि प्रारंभ होने पर) समय में भी की जाती है।

शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में आना भी साभिप्राय है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा पूर्ण होता है और कृष्ण पक्ष में क्षीण। उसकी वृद्धि के साथ-साथ संसार के संपूर्ण रसवान पदार्थों में वृद्धि और क्षय के साथ-साथ उनमें क्षीणता स्वाभाविक है। इस तरह क्रमशः घटते-घटते वह चंद्र अमावस्या को बिलकुल क्षीण हो जाता है। चराचर के हृदय के अधिष्ठाता चंद्र के क्षीण हो जाने से उसका प्रभाव संपूर्ण भूमंडल के प्राणियों पर भी पड़ता है। परिणामस्वरूप उनके अंतःकरण में तामसी शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जिनसे अनेक प्रकार के नैतिक एवं सामाजिक अपराधों का उदय होता है। इन्हीं शक्तियों को भूत-प्रेत आदि कहा जाता है।

ये शिवगण हैं, जिनके नियामक भूतभावन शिव हैं। दिन में जगत आत्मा सूर्य की स्थिति तथा आत्मतत्व की जागरूकता के कारण ये तामसी शक्तियाँ विशेष प्रभाव नहीं दिखा पातीं किंतु चंद्रविहीन अंधकारमयी रात्रि के आगमन के साथ ही इनका प्रभाव प्रारंभ हो जाता है। जिस प्रकार पानी आने से पहले पुल बाँधा जाता है, उसी प्रकार चंद्रक्षय तिथि आने से पहले उन तामसी शक्तियों को शांत करने के लिए इनके एकमात्र अधिष्ठाता भगवान आशुतोष की आराधना करने का विधान शास्त्रकारों ने किया है।

यही कृष्ण चतुर्दशीकी रात्रि में शिव आराधना करने का रहस्य है, परंतु कृष्ण पक्ष चतुर्दशी प्रत्येक मास में आती है, वे शिवरात्रि क्यों नहीं कहलातीं? फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में ही क्या विशेषता है, जो इसे शिवरात्रि कहा जाता है?

जहाँ तक प्रत्येक मास की चतुर्दशी के शिवरात्रि कहलाने का प्रश्न है तो निश्चय ही वे सभी शिवरात्रि ही हैं और पंचांगों में उनके इसी नाम का उल्लेख भी किया गया है। यहाँ इस अंतर को अधिक स्पष्ट करने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि फाल्गुन की इस शिवरात्रि को 'महाशिवरात्रि' के नाम से पुकारा जाता है। जिस प्रकार क्षयपूर्ण तिथि (अमावस्या) के दुष्प्रभाव से बचने के लिए उससे ठीक एक दिन पूर्व चतुर्दशी को यह उपासना की जाती है, उसी प्रकार क्षय होते हुए वर्ष के अंतिम मास से ठीक एक मास पूर्व इसका विधान शास्त्रों में मिलता है, जो सर्वथा युक्तिसंगत है।

सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह पर्व वर्ष के उपान्त्य मास और उस मास की भी उपान्त्य रात्रि में मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त हेमंत में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई अज्ञात सत्ता प्रकृति का संहार करने में जुटी हो। ऐसे में चारों ओर उजाड़-सा वातावरण तैयार हो जाता है। यदि इसके साथ भगवान शिव के रौद्र रूप का सामंजस्य बैठाया जाए तो अनुपयुक्त नहीं होगा। रुद्रों के एकादश संख्यात्मक होने के कारण भी यह पर्व 11वें मास में ही संपन्न होता है, जो शिव के रुद्र स्वरूपों का प्रतीक रूप है।




Tuesday, 6 February 2018

रुद्राक्ष धारण करें और पाएं यह सब

रुद्राक्ष धारण करने से मिलने वाले लाभ :




रुद्राक्ष धारण करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं- 
.  रुद्राक्ष धारण करने वाले से स्वयं भगवन रुद्र ( शिवशंकर ) बहुत ही प्रसन्न होते हैं और उस पर अपनी कृपा -          दृष्टि बनाये रखते हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से शारीरिक - स्वास्थ्य ठीक बना रहता हैं।
  रुद्राक्ष धारण करने से हृदय - रोगों में आराम मिलता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से दीर्घायु प्राप्त होती हैं और आकाल - मृत्यु से सुरक्षा होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से मन - मस्तिष्क को शान्ति प्राप्त होती हैं और मानसिक रोगों में लाभ होने लगता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को अपार सुख - समृद्धि की प्राप्ति होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से सभी प्रकार के दुःखों और पापों का शमन होने लगता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति के ऊपर किसी भी प्रकार के - भुत - प्रेत , पशाच , डाकिनी , ऊपरी हवा ,          टोना - टोटके , तन्त्र - मन्त्र आदि का कोई असर नहीं होता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से पुण्यात्मा लोगों के पुण्यों में धीरे - धीरे वृद्धि होने लगती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से पापी लोगों के  पापों का शमन होने लगता हैं और उनका मन पनः पाप की ओर                अग्रसर नहीं होता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से सामान्य मनुष्य के - उत्साह , आन्तरिक शक्ति , प्रसन्नता आदि में वृद्धि होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से ज्ञान में  वृद्धि होती हैं और बुद्धि भी तेज हो जाती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से तेज और ओज में वृद्धि होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से व्यपार में सफलता मिलती हैं और नौकरी ( सर्विस ) में होने पर शीध्र ही उन्नति प्राप्त          होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से स्त्रियों को मातृत्व -सुख प्राप्त होता हैं और उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति होती हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्तियों के जीवन में सामान्यतः किसी भी वास्तु का आभाव नहीं होने पता हैं।
.  रुद्राक्ष धारण करने से चारों पुरुषार्थों ( धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष ) की प्राप्ति होती हैं।


धन - वृद्धि करने का प्रयोग - किसी शुभ दिन ' श्रीफल ' ले आयें और इसे धो - पोंछकर , लाल रंग के कपड़े में लपेटकर पवित्र स्थान ( पूजाघर ) में रख दें। फिर इस पर - सिंदूर , कपूर , लौंग , छोटी इलायची आदि चढ़ायें। इस पर कोई सिक्का आदि भी चढ़ा दें। फिर धुप - दीप से पूजा करें। उसके बाद में 11 माला इस मन्त्र का जप करें - ॐ श्रीं श्रियै नमः। 
फिर उसे किसी कटोरी में ( कपड़े सहित ) रख दें। उसकी प्रतिदिन पूजा करते रहें। कभी - कभी सिक्के भी चढ़ाते रहें।
इस प्रकार से पूजा करते रहने से - धन वृद्धि होती हैं और लक्ष्मीजी की पूर्ण कृपा प्राप्त होती हैं। धन - सम्पदा की वृद्धि के लिये यह प्रयोग बहुत ही सरल और प्रभावशाली है।

बक्से में रखें - उपरोक्त विधि से ' श्रीफल ' को यदि बक्से में रख दिया जाये तो उसमें मुद्रायें बढ़ने लगती हैं। किन्तु यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिये कि उस बढ़ती हुई राशि से कभी पैसा निकलें नहीं , निकलने से वृद्धि रुक जाती है। समान्य खर्चे के लिये अलग पैसे रखे रहें श्रीफल के पैसे कभी न लें , बल्कि उस पर
कुछ - न - कुछ ( रुपया - दो रुपया ) चढ़ाते रहें। जब धीरे - धीरे काफी पैसे इकटठा हो जायें तो उस राशि को किसी शुभ एवं जनहितकारी कार्य ( जैसे - गरीब बच्चो के स्कूल की फीस , भूखों को भोजन , जरूरतमन्दों को कपड़े , प्याऊ लगवाना , बीमार जानवरों की सेवा आदि ) में खर्च कर दें। यह प्रयोग अनुभूत है और चमत्कारी प्रभाव देखता है।

गोलक में रखें - यदि आप 'श्रीफल ' को गोलक में रखना चाहते हैं तो उसमें भी रख सकते हैं।  'श्रीफल ' को गोलक में रखकर गोलक की प्रतिदिन धुप - दीप से पूजा करें। और उसमें पैसे भी डालते रहें। इस प्रयोग से वह अपेक्षाकृत कम समय में ही भर जायेगा।

अन्न भण्डार में - अन्न भण्डार ( अन्न के गोदाम ) में 'श्रीफल ' रखने से वह सदैव भरा ही रहता है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि -  'श्रीफल ' रखने से अन्न की सुरक्षा ( कीड़े - मकोड़े , चूहों , आग , पानी आदि से ) भी होती रहेगी - इस  प्रकार के संकटों से तो अन्न की सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम करना ही चाहिये। लेकिन  'श्रीफल ' रखने से अन्न भण्डार में वृद्धि होती रहेगी -  इसका तात्पर्य यह है कि - अन्न का संग्रह करने की व्यवस्थयें बनती रहेंगी। वैसे भी सास्त्रों में लिखा है कि - अन्न का संग्रह ही सर्वश्रेष्ठ होता है -
                     
                                         धन्यानां संग्रहोः राजनुत्तमं सर्व संग्र्हात। 
                                       वुभुक्तं हि मुखे रत्नं न कुर्यात प्राण धारणाम।।


दुकान में रखें -  नवरात्रि के नौ दिनों में से किसी भी दिन अपनी दुकान , प्रतिष्ठान , कार्यालय - जहाँ भी
लेन - देन या कोई व्यवसाय होता हो , यह मन्त्र - सिद्ध ' श्रीफल ' किसी सुरक्षित स्थान पर रख दें। उसे नित्य
 धुप - दीप दें और कोई सिक्का चढ़ाते रहें। यह प्रयोग करने से उस प्रतिष्ठान - दुकानदार की आर्थिक - स्थिति में धीरे - धीरे बहुत अधिक सुधार होने लग जायेगा।

 




























Monday, 5 February 2018


आधाशीशी  का दर्द दूर करने के लिए -  यदि किसी व्यक्ति के सिर में आधाशीशी  (अर्धकपारी) का दर्द होता है तो -एक भोजपत्र लाकर उस पर अष्टगंघा से निम्नलिखित प्रकार से यंत्र बनायें -

-अब इस भोजपत्र को रोगी के मस्तक पर बांध दे। ऐसा करने से उसका रोग धीरे -धीरे दूर होने लगता है। अा आवश्यकता होने पर यह प्रयोग लगातार कई दिनों तक करना चाहिये।
 


सुख- शान्ति के लिए -  पूर्व -वर्णित विधि से तैयार पोटली को अपने घर के पूजा -स्थान पर रखें और उसकी प्रतिदिन धुप -दीप से पूजा करते रहें। यह प्रयोग सभी प्रकार से मंगलदायी होता है। इससे मनुष्य को सुख -शांति और  स्म्रद्धि प्राप्त होती है।



एकमुखी रुद्राक्ष - जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से केवल एक धरी होती है - उसे ' एकमुखी रुद्राक्ष ' कहा जाता है। इसे सभी प्रकार के रुद्राक्षों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि - यह साक्षात भगवन शिव का ही स्वरूप है अर्थात - इसमें स्वयं भगवान शिव ही विराजते हैं। इसके दर्शन मात्र से ही मनुष्य का कल्याण हो जाता है तो फिर इसका पूजन करने और इसे धारण करने से कितना अधिक लाभ प्राप्त होगा , इसका अनुमान भी लगाना कठिन है। एकमुखी रुद्राक्ष जिस घर में होता है , वहाँ पर माँ लक्ष्मी विशेष कृपा करती है और उस घर में धन - धन्य की कभी कमी नहीं होने पाती है। इस रुद्राक्ष को धारण करने वाले मनुष्य को किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहता है। इसे धारण करने से सभी प्रकार के अनिष्ट दूर हो जाते है। यह रुद्राक्ष मनुष्य के सभी संकटों और पापो को हर लेता है। यह मनुष्य को मानसिक शान्ति प्रदान करता है।
एकमुखी रुद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ होता है क्योंकि अन्य रुद्राक्षों की अपेक्षा यह कम मात्रा में उत्पन्न होता है। यहाँ पर ध्यान रखने की बात यह है कि - एकमुखी रुद्राक्ष और चौदहमुखी रुद्राक्ष का प्रभाव एक जैसा ही होता है , अतः यदि एकमुखी रुद्राक्ष न मिल पाये तो उसके स्थान पर चौदहमुखी रुद्राक्ष का प्रयोग किया जा सकता है।